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"रिश्ता"

क्या रिश्ते खून से बनते हैं?
या खून के रिश्ते ज़्यादा तंग से हैं!

खून की रिश्ते में क्या साझेदारी है?
क्या खून ही बिखरे रिश्ते की ज़िम्मेदारी है!

रिश्ते में खून हो तो क्या प्यार ज़रूरी नहीं?
अपनेपन की कमी हो तो क्या रिश्तेदारी अधूरी नहीं!

रिश्ते में खून का होना क्या आंसुओं का हक रखता है?
“आखिर खून का रिश्ता है”, फिर ये जुमला क्यूं बेड़ियों में जकड़ता है!

खून का ना होना क्या रिश्ते की कमज़ोरी है?
फिर ज़रा से मन मुटाव से क्यों सालों की दूरी है!

रिश्ते में खून का होना क्यूं इतना बोझिल है?
क्यूं खून के रिश्ते में सही गलत का फर्क ही ओझल है!

क्यूं चुनने की आज़ादी, रिश्ते में खून के ना होने पर निर्भर है?
और क्यूं खून के रिश्ते में ही भरोसे की नींव सबसे जर्जर है!

क्यूं अक्सर खून का वो रिश्ता मंज़िल से भटका जाता है?
और कभी यूं ही एक बेनाम रिश्ता सफ़र को मंज़िल दे जाता है!

मैनें खून के रिश्तों को खूनी बनते देखा है!
और अनजान रूहों को सालों साथ चलते देखा है!!

अपने अपनों के साथ चलना, खून का मोहताज नहीं बनाता!
रगों में खून भले ही एक हो, पर कोई गुनाह सहना नही सिखाता!!

खून का होना या ना होना, रिश्ते की पहचान नहीं बनता!
और अपनेपन का वो रिश्ता खून की एक बूंद से नहीं पनपता!!

-“Tiara”