अक्श दिखा
कमबख्त दिखा
हर वक़्त दिखा
पर मस्त दिखा
अक्श था या थी चाहत
फिर ये शक दिखा!
मिराज़ सा एहसास दिखा
पर अक्श में कुछ सच दिखा
सच छुपा तो क्यूं शक दिखा
इस सवाल का कुछ मोल दिखा
था सवाल या खुद जवाब ही
इस बात से कुछ खुलता दिखा!
परत नहीं परतें दिखीं
उस आइने की कुछ शर्तें दिखीं
धुली आंखों से सब धुंधला दिखा
जोड़ लो पलकें,आईना कहता दिखा
बंद की थी आंखें या खुले थे राज़
जब अक्श की सच्चाई से पर्दा गिरता दिखा!
अक्श में खुद को फिर मैं दिखा
गिरता और संभलता, पर मैं दिखा
मैं जो था, पर बाहर से नहीं, वो दिखा
मैं खुद ही कैदी, कैद और जेलर दिखा
अक्श सच भी था और आज़ाद सोच भी मेरी
पर अपने ही अक्श से मिलकर क्यूं एक हक ना दिखा!!
-Tiara