हर रोज़ सी वो भी एक सुबह थी
ना जाने क्यूं, मैं खुद से खफा थी!
किसी बात पर खुद से ही नाराज़ थी
जो पल रहा था गुस्सा मेरे अंदर, वो मेरी ही आवाज़ थी!!
अचानक उस खुशबू ने ध्यान मेरा खींचा था
पर आस पास तो मेरे, न कोई बगीचा था!
इर्द-गिर्द अपने फिर मैंने उसको खोजा था
जैसे सालों पहले मैंने उसे यहीं-कहीं बोया था!!
उस छोटी सी टोकरी से वो झांक रहा था
मेरी ढूंढती निगाहों को भी वो भांप रहा था!
मेरे अंदर के गुस्से ने मुझे जाने से रोका था
पर उसके स्पर्श से मेरा हंस जाना, उसका भरोसा था!!
उसे हाथों में लिए, मैं कुछ सोच में पड़ गई
पता ही ना चला कि कब शाम ढल गई!
ये फूल भी कितने मासूम होते हैं
हमें खुश करने क्या-क्या नहीं खोते हैं!!
क्या इनकी दुनिया में भी गम और खुशियां होती होंगी
अगर हां, तो फिर वो कैसी दिखती होंगी!
क्या किसी नई कोपल को देखकर ये जश्न मनाते होंगे
या किसी फूल में तब्दील होकर गुरूर से इतराते होंगे!!
क्या इनके बगीचे में भी कुछ मनचले फूल होते हैं
क्या ये भी रंग और जातियों के अंतर में बड़े होते हैं!
क्या अमीर बागीचों के फूल इन क्यारियों को छोटा कहते होंगे
क्या कम सुंदर से वो खुशबूदार फूल भी वही सब सहते होंगे!!
सबकी उदासी दूर करने वाले, इनको कौन मनाता होगा
हर त्यौहार को सजाने वाले, इनको कौन जताता होगा!
इस हवा को महकाने वाले, इनको कौन इत्र लगाता होगा
पत्थर को भगवान बनाने वाले, इनको कौन क्या चढ़ता होगा!!
गम हो या हो खुशी, ये साथ हमारा देते हैं
क्या सोचा है कभी, बदले में हमसे क्या लेते हैं!
बदले जैसे शब्दों से क्या इनका पाला पड़ता होगा
कर्ज चुकाओ पहले मेरा, क्या कहते कोई फूल अकड़ता होगा!!
तुम इंसानों की सोच अरे कहां तक जाती है
जो शुरू हुआ नहीं कभी, उसे तक खत्म कर आती है!
हंस रहा हो कहते हुए वो फूल, लग रहा था ऐसा
मैं मनमोहक सा फूल बेचारा, नहीं तुम इंसानों के जैसा!!
हम खिलते, गिरते, मिलते, उठते और मुरझाते हैं
पर मुरझाए से तुम्हारे चेहरों पर, खुशी देख खुश हो जाते हैं!
इस छोटी सी ज़िन्दगी में, हम हर एहसास निभाते हैं
फिर तुम्हारे ये साल, यूं एहसासों को ढूंढने में क्यूं निकल जाते हैं!!
-"Tiara"