Launchorasince 2014
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Kaash ye dehshat yahin tham jati..!!

इंसानियत का नक़ाब ओढ़े..
खड़ा था वो हैवान वहां..
मासूम वो मोहतरम खड़ी थी जहां..
बेगुनाह उसकी फितरत..
पाख़ उसका दामन था..
शैतान की उस देहशत का..
डर दिल ओ ज़हन में दफन था..
मुर्झा गई वो कली..
रौंदी गई है पैरों तले..
देख ज़रा ओ बेरेहेम..
तेरी बेदर्दी के सिलसिले..
आदम है तू मगर..
इन्सानी रूह नहीं तेरी..
मौत का किसी की कारण बनते..
तूने की ना पल भर की भी देरी..
अरे नामुराद तेरी दरिंदगी..
कफ़न भी ना तुझे अदा फरमाएगी..
जिस्म के भूखों तुम्हें..
मौत भी सुकून की ना आएगी..
वो जल गई जो पाख़ थी..
मिट्टी में जो मिल गई..
उसके जिस्म की वो राख़ थी..
दफन हुई वो..
शिकार हुई जो..
अरे बेदर्द जिस्मानी पुतलों..
तुम में इंसानियत क्या ख़ाक थी..!!