ज़िन्दगी अजीब है, फिर भी सजीव है
धूप है, छांव है
कहीं शहर है, कहीं गांव है
शोर है कहीं कभी, कभी ख़ामोशी का साथ है
कहीं कभी मैं अकेला, कभी भीड़ का आगाज़ है!
कभी सोच कर भी कुछ कर ना पाए, बिन सोचे कभी चल पड़े हज़ार हैं,
कहीं खाली पड़े मकान कई, कहीं भीड़ से भरे बाज़ार हैं!
कहीं थमी सी सड़कों पर दौड़ती रूह है,
कहीं भागते समय में, रुके हम कुछ यूं हैं!
कहीं जगमगाती रोशनी में सब धुंधला सा है,
कभी बंद कर आंखें सोचा तो सब उजला सा है!
कहीं अल्फाजों से ज़्यादा चमकती आंखों पर भरोसा है,
तो कहीं गैरों की खातिर, कई बार अपनों को कोसा है!
कहीं आप से तुम में, एक सफ़र है,
कभी कोई अजनबी लगता हमसफ़र है!
कभी ज़िन्दगी में रंग हैं, साज है
कभी आस पास, हर अपना, यूं ही नाराज़ है!
कहीं थकन में गुम हो चुकी हसरतें हैं,
तो कहीं कोई जी रहा सपने दिन और रात है!
कहीं हाथों में गीता और दिल में कुरान है,
कहीं अपनी ही मिट्टी पर कहलाते मज़हब, मेहमान हैं!
कभी घरों में राजनीति और राजनीति में भाईचारा है
पर हर सूरत-ए-हाल हारता ‘सच’ बेचारा है!
नीले आसमां तले रंग बिखरे हज़ार हैं
पर मुस्कुराते चेहरों से पूछो कि दिल कितने बेज़ार हैं!
यहां-वहां की बातों में हम हुए मशरूफ फिर आज हैं
इस भागती ज़िन्दगी में चलो फुरसत के कुछ पल निकाल लें…
-“Tiara”