ऐ ज़िन्दगी,
मुक्तसर सी बात है,
हमें तुमसे प्यार है।
दुनिया के शोर-शराबे में
खुद को तुझसे दूर रहते अक्सर पाया है
और गहरे सन्नाटे में जब कभी
दिल ने तुझसे मिलने की इजाज़त माँगी
उसे कई मर्तबा शांत कराया है
और उसने भी मेरी हिदायत को खूब सुना।
लोग तमाम उम्र गुज़ार देते हैं तुम्हारी खोज में
या कुछ अनजान ही रहना मुनासिफ समझते हैं।
मैं अनजाने में तुमसे रूबरू हुई
और अब दिल की गीतों पर झूमकर ही
तो मेरी मुलाकात तुमसे हो पाती है।
अब यहाँ सपने गूंज रहे हैं
उनसे ऊंची कोई गूंज है तो वह है
उन्हें मुकम्मल करने की।
तुम सर्दी के मौसम की दोपहर की तरह
जल्दी से ढल तो नहीं जाओगी?
अब मिली हो तो ज़रा ठहर जाओ,
अब तुम्हारा साथ छुटता नहीं।