अभी मैं ख्वाबों की चादर बुन ही रही हूँ
चलने के लिए रास्ते चुन ही रही हूँ
खलवत में बैठकर हसरतों की आवाज़ें सुन ही रही हूँ
फुरसत में कभी पूछोगे मुझसे मेरी पहचान
तो जानोगे कलाकार की तरह खुद को रच रही हूँ मैं।
कभी पीला रंग भरा, कभी सफ़ेद
कभी गुलाबी को गहरा किया
कभी पंक्तियों को लह में सजाने की कोशिश की
कभी उन्हें ऐसे ही छोड़ दिया,
बिल्कुल इसी तरह।
तस्वीर की तरह, कविता की तरह
गीत की तरह और नृत्य की अदा की तरह
खुद को सलीके से बना रही हूँ मैं।
एक रचना रच रही हूँ मैं
फुरसत में कभी पूछोगे मुझसे मेरी पहचान
तो जानोगे कलाकार की तरह खुद को रच रही हूँ मैं।