Launchorasince 2014
← Stories

भंवर बातों का

बातों बातों में न जाने कब होती थी सुबह,
मेरे हर मर्ज की तू बन रही थी दवा,
कुछ ही पल में पिघल गए मेरे पुराने गम,
यूं ही बातों बातों में फिर बदल रहें थे हम ।

वो बातें ही थी, जो खींच ले गयी थीं हमें तेरी तरफ,
वो बातें ही तो थीं, जो याद आतीं रहीं तेरे जाने पर भी,
हम उलझ कर रह गए , भंवर में तेरी इन बातों की,
समझ ना आया कुछ , दोस्तों के लाख समझाने पर भी।

सपने तूने दिखायें अगले जन्म तक के ,
हमने भी आंख मूंद कर उन्हें सीने से लगाया,
निभाना था ही नहीं जब इस जन्म में ही ,
तो क्यूं खेल खेल में हमसे दिल लगा लिया?

जिस ग़म से तुझे हमने उभार दिया,
उसी गम में तूने हमें दिया ढकेल ,
गम का खज़ाना तो तेरा भी था ना,
तो क्यूं किया हमारे दिल से ऐसा खेल ?

हम ही थे पागल ,जो फिर पड गऐ इश्क के जंजाल में,
आवारा दिल चल पड़ा था हमसफर कि तलाश में,
अब समझ आया कि आखिर समंदर का पानी क्यूं है नमकीन,
कहीं ये आंसुओं से तो नहीं भरा, जिनके भी टूटे हों सपने रंगीन ?