Launchorasince 2014
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मैं किसी थी

आज ख़्वाबों में वो फ़िर आयी
अपने साथ वही किस्से कहानियां लायी

है अब थोड़ी धुँधली सी थी उसकी सूरत
मानो ओस में ढ़की हो कोई मूरत

वो प्यार का एहसास आज भी गहरा था
उसकी ज़ुबान पर मेरा ज़िक्र आज भी ठहरा था

उसके स्नेह को तरसी थी जो नज़रें
आज फिर उसे देख भर आयी वो ही आँखें

वो प्रेम दुलार से मुझको देख रही थी
बताओ कैसी हो ये पूछ रही थी

उन निग़ाहों में मेरे लिए फ़िक्र आज भी थी
उस हँसी में मेरी कामियाबी की फ़क्र आज भी थी

आज भी ममता भारी आवाज़ में उनसे पुकारा था
ज़वाब न देने पर प्यार से मुझे फटकारा था

जो मेरी आँख खुली तो वो चल पड़ी
बहुत वक़्त गुज़र गया कह वो हस पड़ी

9 सालों में कई बार वो मिलती थी
अपनी गोद मे सर रख उसे सहलाती थी

इस बार भी मुलाकात बिल्कुल वैसी ही थी
वो गले न लगा पायी बस पूछती रही मैं किसी थी

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