Launchorasince 2014
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सपने में तुम

आज फिर सपने में तुम आए

अपने चहरे पर वही मासूमियत की चादर ओढे

 

कमाल की बात है

इतने समय बाद भी दिमाग ने तुम्हारी तस्वीर ताज़ी रक्खी है

 

तुम्हें देखते ही झटपट गले लगाने को दिल किया

पर देखो तो, सपने में भी इतनी हिम्मत ना हुई

 

बस हाथ मिलाया,

मेरे सपने में भी, मर्ज़ी तुम्हारी रही

 

कभी कभी सोचती हूँ की जो ये तुम्हारे आने जाने का सिलसिला है

कब तक रातों में, और सूरज से पहले जगाएगा

 

अब मैं तुम्हारा नाम तक नहीं लेती

ना किसी मेहफ़िल में, न दोस्तों के संग, और न ही अकेले में

 

फिर भी जो अपनी नजदीकियों के दौरान

तुम्हारी जिन बारीकियों से मैं रुबरु हुई थी

 

वो आज भी एकदम ताजा हैं

उनकी सटीकता आज भी उतनी लुभावनी

 

तुम उस सदियों पुरानी व्हिस्की की तरह हो

जिसका नशा शायद आज भी उतरा नहीं