Launchorasince 2014
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प्रेम में ख़र्च हो जाने का भी अपना मज़ा है।

मुझे 'बचाकर' प्रेम करना नहीं आया, मैंने चाहने में हर बार ख़ुद को पूरा ख़र्च कर दिया। तुम्हारी अनुपस्थिति में 'मैं' तलाशती हूँ तो हताशा हाथ लगती है। मैंने नंगे आकाश में उड़ती चिड़िया के पंख गिने थे, नीचे झाँकने पर तुम्हारी कमी नोंचती थी। मैंने घड़ी की सुई का संगीत रट लिया था, इंतज़ार करना मेरा नियति में था। मैंने धुंध भरी सड़कों पर हर तरफ़ तुम्हारा चेहरा उभरता देखा था, बिना चित्रकार हुए मैंने उकेरी थी तुम्हारी छवि कुदरत के हर कैनवास पर। मैंने तुम्हें खो सकने जितना भी नहीं पाया, पर कभी-कभी मेरा मन करता है अहं से भर जाऊँ। अहं कि मैंने प्रेम का नाटक नहीं, प्रेम किया है; कि मैंने ख़ुद को चवन्नी भर भी बचाकर नहीं रखा... प्रेम में ख़र्च हो जाने का भी अपना मज़ा है।