Launchorasince 2014
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शहर से गुज़रते हुए

वो पीपल के पेड़ के बगल वाला मकान
सामने था जिसके एक छोटा सा जलासार
वही जिसके बाद थी राशन की दुकान
पास ही था मंदिर बस सड़क के उस पार

पता ये सुनते ही काफ़ी कुछ याद आया
नज़रों के सामने वो 3 तल्ला मकान आया
एक आंगन, बागीचा बड़ा....
जिसमें थे नीम और जामुन
था सब कुछ सुंदर और हरा भरा

इस घर को बाबा ने बड़ी मेहनत से संजोया था
मानो एक एक मोटी को हिफाज़त से धागे में पिरोया था
सोचा था की तीनों बेटे इसे मिल कर सजाएंगे
रात को निवाला वो साथ बैठ ही तो खाएंगे

बाबा थे नादान उन्हें मालूम ना था
टुकड़े होंगे घर के उन्हें मालूम ना था
वो आंगन था टूटा, टूटी थीं वो दीवारें
"मुझे कम क्यों मिला" इस बात पर हुई कईं तकरारें

माना बाबा को गए काफ़ी अरसा हुए था,
मगर हर हथौड़े की मार पर एक सांस ने फिर दम तोड़ा था
उस दिन घर ने बाबा की तरह ही साथ छोड़ा था
रिश्तों के सामने थक हार वो भी रोया था

आज भी वो आंगन, वो घर, वो तालाब सपनों में आते हैं
वो घर, वो शहर दिल में यादों के सैलाब से लाते हैं
सब कुछ तो है यहां मगर...
मगर उस शहर से गुजरते हुए वो मकान और बाबा बहुत याद आते हैं

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