Launchorasince 2014
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रुबरु

जब कभी फुरसत के दो पल मिलते है
कुछ गुफ़्तगू खुद से भी कर लेती हूँ
उदास बैठे मन को
हंसाने की कोशिश कर लेती हूँ

हक़ीकत से कुछ दूर
ख़्वाब नये भी देख लेती हूँ
हार कर बैठे इस दिल को
उत्साह की नई ऊंचाइयां महसूस करा लाती हूँ

तन्हा इस क़दर हूँ मैं
जो अजनबियों को देख भी मुस्कुरा देती हूँ
कुछ रिश्ते तो टूट गये
सोचा आज कुछ नए बना लेती हूँ

कभी हार जाती हूँ
कभी जीत भी जाती हूँ
इन सबों के बीच स्वयं को
बेहतर बनाने की कोशिश हर बार करती हूँ ..