दलदल में फंसते चले गये,
पर अपने गमों पर हंसते चले गये,
सोचा था अपने साथ देंगे,
पर वो तो शब्दों से ही डसते चले गये..
कुछ बातें ऐसी सुन्ने को मिली,
झंझोड कर रख दिया रूह को हमारे,
कानों से सीधे जब दिल से टकराई तो लगा,
जीभ जैसी तलवार आज तक बनी ही नहीं..
शिकवा शिकायत करने की उम्र ढल चुकी हमारी,
सामने किसी के नहीं करनी हमें अपनी आंखें नम,
पर मन पर गांठें बांध ली हैं बहुत सारी,
जो आखरी सांस तक नहीं भूला पाएंगे हम..
कुछ बातें ऐसे घर कर गयी हैं,
मानो हमारे अस्तित्व का हिस्सा हो,
बिन सोचे उन्होंने किया वार तलवार से,
लगा जैसे एक गायब मयान का किस्सा हो..