लहू तेरा खौल रहा ,
निशवास तेरा रहा फूल,
बेबस बैठा फिर भी जब,
समझा जा रहा तुझे बस धूल..
मुठ्ठी तेरी बंधी हुई सख्त,
सहनशीलता तेरा एक उसूल,
मां ने कहा था,एक से दस कि गिनती कर,
ताकी क्रोध में ना कर बैठे कोई भूल..
जिंदगी शतरंज, तू बस एक प्यादा,
पर प्यादे के बिना कैसे खेलें कोई ये खेल आधा,
भूल ना जाएं तूझे चलाने वाले ज़रा भी,
कि अंत में प्यादा भी बन सकता है रानी..
मूक है अभी,पर कभी तो बोलेगा,
समय आने पर ज़बान के ताले तोड़ेगा,
अभी मजबूर है, बेबस है तू,
अपने भीषण क्रोध का रक्षक है तू..
शोष्ण करे जो तेरा,
भरेगा कभी उसका भी पाप का घड़ा,
अचंभे में आएगा वो,
जब शक्ति का तेरा उसे एहसास हो..
चुप्पी को तेरे , उसने समझने में की बड़ी भूल,
फिलहाल शुक्र करे वो, कि तेरे अंदर अब भी हैं ऐसे उसूल...
--- क्रोधित,
सम्पूर्णा