Launchorasince 2014
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कलयुग

कितने युग बदल गए पर बदल सकी ना बहुतों की सोच ,
जिनकी बदलीं भी हो, वह भी खडे हैं खामोश।

इतने सारे भगवान , इतने सारे भक्त,
दिखावे का दिलफेंक और मन तेरा इतना सख्त।
दान पुण्य करके क्यूं ढिंढोरा तू पीटे,
'बेटी बेटी' कैहता रहता, पर मन से चाहता था तू बेटे।

अब भी पूजते हैं बस राम को ही, रावण को हर साल बस दहन में जलने की ही सजा़,
कभी ये सोचा ,
क्यूं था ऐसा कि मर्यादा-पुरुशोत्तम ने सिता के दुखों कि ना की कोई दवा?

पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आ रही यही कहानी,
आंख मूंद कर मान लिया है , जो भी सुना बुजुर्गों की ज़ुबानी।
गलत नहीं है उनकी सुन्नी, पर एक बार कभी खुद से भी सोचा कर,
अंतरिक्ष से भी घूम कर आया, फिर भी मनुष्य तू बेखबर।

लोकलाज का इतना डर,
समाज में इज्जत ना जाए बिखर,
मंदबुद्धि बालक को बनना था डाक्टर,
नोटों की बौछार कर दी, बिन सोचे की होगा बवंडर।

दौड़ रहे हैं सब, है मुकाम की ना कोई खबर,
मुकाबले में शामिल, पर अनजान है ये डगर।

पैसा हो तो सब है, किसे चाहिए कोई सच्चा रिशता,
नहीं चाहिए दिल के रिश्ते, पैसा ही तेरा फरिशता।

कभी ये सोचा , क्यूं अब भी बंटा हुआ है ये देश,
क्यूं बंटी हुई है हर गली, क्यूं है मन में भरा ये द्वेष।

फर्क बस इतना कि पहले वार युद्धश्रेत्रो में थे करते ,
अब पीठ पीछे करते हैं, निसंकोच एवं हंसके।
हिंदू , मुस्लिम, सिख, ईसाई, कभी हो पाएंगे भाई भाई?
कौन कैसे जीतेगा ये इंसानियत की लड़ाई?