दफ़्तर से घर लौटे ही थे ,
कि बात कुछ इस तरह शुरू हुई
हमारी प्राणप्रिया छूटते ही बोलीं ,
"जनाब आने में इतनी देरी क्यों हुई ?"
"अरे ! पहले पानी तो देदो "
चिड़चिड़ा कर हम बोले
"चुपचाप बताइए किसके घर से खाकर आ रहे हैं ,
पानी पूरी और छोले भटूरे ?"
पत्नी के ऐसा बोलते ही
हमने उनके लिए खरीदी अंगूठी बाहर निकाली,
वह खुशी से उछल पड़ी , बोलीं
"अरे पानी क्या , आज तो सारी बोतल तुम्हारी"
फिर उसने प्यार से कुछ ऐसा फ़रमाया ,
" इतना खर्चा क्यों किया !
आज ही तो हमने
सारा अकाउंट खाली करवाया "
कुछ और बोलने की वजह अब न रही ,
हमने मन में सोचा
"इतनी प्यार से हो बोल रही ,
जैसे समस्या की अनामिका को
तुम ही हो समाधान की अंगूठी ! "