Launchorasince 2014
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नारी की वाणी

न मांगा उन तारों को 

न चंदा , न अंगारों को 

मांगती हूं आज तो बस एक प्रश्न  का उत्तर,

क्यों माना है मुझे एक कलंक इस धरती पर ? 


क्या मेरा यह रूप है मेरी ही कृति ?

क्या कर सकती हूं मैं

 जब बुरी तेरी खुदकी है नीति ।


न मांगा कभी तुमसे 

यह पैसा , यह दौलत ,

मैं हूं तो सिर्फ एक मामुली सी औरत ।


यह दहेज जैसे नियम 

न मेरे खुदके बनाए हैं ,

फिर करके क्यों पालन इनका 

बनते मेरे अपने भी पराए हैं ।


बेच दिया है मुझे , 

इस दुनिया में तुमने ।

न मिट पाएंगे यह पाप ,

तुम्हारे किसी भी जीवन में ।


यूं तो इस धरती को भी , माँ का दर्जा दिया है ,

है तो वह भी एक नारी , फिर क्यों इतनी परवाह है ?


क्यों हक नहीं है मेरा कोई खुशी पाने का ?

क्यों नहीं है तुम्हें इंतज़ार 

मेरे इस दुनिया में आने का ?


क्या खो सकती हूं मैं ,

जब कुछ दिया ही नहीं तुमने ? 

क्या गुनाह है मेरा 

यही खयाल है मन में ।