न मांगा उन तारों को
न चंदा , न अंगारों को
मांगती हूं आज तो बस एक प्रश्न का उत्तर,
क्यों माना है मुझे एक कलंक इस धरती पर ?
क्या मेरा यह रूप है मेरी ही कृति ?
क्या कर सकती हूं मैं
जब बुरी तेरी खुदकी है नीति ।
न मांगा कभी तुमसे
यह पैसा , यह दौलत ,
मैं हूं तो सिर्फ एक मामुली सी औरत ।
यह दहेज जैसे नियम
न मेरे खुदके बनाए हैं ,
फिर करके क्यों पालन इनका
बनते मेरे अपने भी पराए हैं ।
बेच दिया है मुझे ,
इस दुनिया में तुमने ।
न मिट पाएंगे यह पाप ,
तुम्हारे किसी भी जीवन में ।
यूं तो इस धरती को भी , माँ का दर्जा दिया है ,
है तो वह भी एक नारी , फिर क्यों इतनी परवाह है ?
क्यों हक नहीं है मेरा कोई खुशी पाने का ?
क्यों नहीं है तुम्हें इंतज़ार
मेरे इस दुनिया में आने का ?
क्या खो सकती हूं मैं ,
जब कुछ दिया ही नहीं तुमने ?
क्या गुनाह है मेरा
यही खयाल है मन में ।