Launchorasince 2014
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रात

बचपन से सुनती बड़ी हुई,

कि भूत नाम की चीज़ नहीं

डरना न कभी अंधेरों से

डरने जैसी कोई रीत नहीं।


तू बढ़ आगे , मुड़ न पीछे 

भगवान है तेरे साथ खड़ा,

तू चल ऐंठके , न तू रुक

चाहे हो दरिया कोई बड़ा।


हाँ मान गई जो भी था सुना

आगे बस बढ़ती जा रही थी,

इससे पहले कि दौड़ सकूं,

हाथों में उसके साड़ी थी।


मैं जान लगाकर खींच रही 

वो आंख दिखाकर बुला रहा,

भगवान बताया जिसको

वो हैवान था मुझको रुला रहा।


उस रात अंधेरे से डरने का

पहली बार एहसास हुआ,

उस दिन से ही तो इस लंका पर,

रावण का था राज हुआ।


तूने क्या सोचा मुंह बंद करने से

नारी का नाश हुआ ?

जिसको द्रौपदी समझता तू

उसमें काली का वास हुआ।


इससे पहले के तू सोचे

कि ये औरत कमज़ोर है,

आ तुझको में दिखला दूं

इन हाथों में कितना ज़ोर है।


जिस अंधेरे में डरके

मैंने वो शोर मचाया था,

मैं उसी रात का सन्नाटा ,अब मैंने तुझे डराना है,

मैं उसी रात की खामोशी जिसने अब तुझको खाना है।


औेज़ार न मेरे पास कोई,

फिर डरने की क्या बात है ?

तू खड़ा तो होजा आगे

तेरी दिखाऊं फिर औकात मैं ।