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Diwali: a Pretentious Holiday?


Diwali known as the 'Festival Of Lights' and Holi known as 'Festival of Colors' are the biggest festivals of India. Diwali falls on New Moon Day and Holi falls on Full Moon Day. In India, Diwali is the start of Winter season and Holi is the start of Summer season.

Earlier on Holi, people would visit neighbors, relatives and greet each other by colors and hugs. Main motto of festival is said to be that keeping relations alive in the community and solving of disputes, if any by community arbitration. Suppose, If any dispute has arisen during the past year among two friends or family or individuals, they will meet at the festival of Holi. They will burn the differences there itself and forgive each other in presence of community. 

Diwali  is celebrated to worship GODDESS LAKSHMI praying HER to give wealth and prosperity to the family. Other reason of celebration is that it is believed that Lord Rama reached back to his home town after winning the war of Lanka. it falls on New Moon Night (अमावस्या)

कह दो अंधेरों से, आज कहीं और जा बसें..... ।

मेरे मुल्क में रौशनी का सेलाब आने वाला है .. ।

कह दो पापियों को किसी और देश में जा बसें..।

पवन के देश में राम लंका जीत कर आने वाला है।

नव वर्ष में प्रभु से है पवन की प्राथना बारम्बार.....!

भारत हो नंबर 1, विश्व भर में हो उसका सत्कार।

विश्व से हो इस बरस आतंकवाद का पूर्ण संहार।

Today mostly people fake smiles, keep fake relations and even wishes festivals with fake greetings. Fake is a New Trend & It seems everyone has a new style.

Faking Festival Greetings:-

कल लोगों के अंगूठे दर्द से चरमराते दिखे, फेसबुक और व्हट्ससप्प पर मैसेज देखते और करते।
पवन इक वो होली/दिवाली होती थी की,  जब हम थक जाते थे दोस्तों से झप्पी डालते डालते।
और होली/दिवाली के बाद पेट दुःख जाता था, दोस्तों के साथ व्यंजन और मिठाइयां खाते खाते।
इक ये दिवाली देखी लोगों फ़ोन पर वीडियो को व्हाट्सप्प और फेसबुक पर मिठाइयाँ, रंगों की तस्वीरें भेजते भेजते।

इस दिवाली पर फ़ोन में तो संदेशों की तो अधिकता पाई।

पर लोगों मैं इंसानी जज़्बातों की काफी कुछ न्यूनता पाई।

ये क्या छोटी दिवाली थी, या कोई क़यामत थी की रात।
रात भर फ़ोन की टिंग टिंग ने किये,  नींद के बुरे हालात।

सुबह देखा बेचारे फ़ोन की बैटरी तो वीडियो के लोड से मरी जा रही थी।

इधर फ़ोन पर और उधर दरवाज़े पर घंटी पर घंटी बजती ही जा रही थी।

जब दरवाज़े पर घंटी बजती दिल धड़कता की अब तो ये अपने दोस्त ही होंगे आये।
पर अक्सर वो दोस्तों के ड्राइवर निकलते, जो उनकी तरफ से थे तोहफ़े लेकर आये।

ये कैसी दिवाली है पवन, व्हाट्सप्प पर तो है संदेशो का ताँता।

पर ज़्यादातर दोस्तों ने, साथ मैं आ कर खुशियों को भी न बांटा।

बेटा अपनी बीवी बच्चों का साथ पूजन मैं लगा है उनके घर फ्लैट सजे सजे हैं।
देख पवन दूर उसके बूढ़े माँ बाप दीयों मैं तेल डालने मैं लगे हैं पर चेहरे बुझे हैं।


दिवाली की रात को मैंने लक्ष्मी माता को विष्णु जी से कहता सुना, प्रभु ये कैसी पूजा है:-

बोलो प्रभु क्या मैं दूँ इनको वरदान जो करते हैं अपने माँबाप का अपमान।

ये करें अपने माँबाप की निरंतर पूजा, तो इनका मैं घर भर दूँ कृपानिधान।

पर ये खुद करते हैं हर रिश्ते में, झूटी मुटी बनावट।
जिसके बदले में मिलती है इन्हेंजीवन मैं कड़वाहट।

वो वक़्त अलग था जब सत्य शर्मा ने पूजा के लिए माँगा था राजा से ये वरदान।

की कर दे वो उस अमावस की रात सब घर अँधेरा तो राजा ने किया वो एलान।

उसके दिल मैं आत्मा में था बड़ों का सम्मान, तभी मैंने दिया था उसे ये वरदान।
की तीन पीढ़ियों तक रहूंगी तेरे घर मैं तू कर दिल से पूजा और हो जा धनवान।

बनावटी ज़िन्दगी जीते है आज ये इंसान क्या कर रहें ये पति वर।

छोड़ मांबाप के पाओं को पटक रहे है दुसरे दर पर अपना ये सर।

अब क्यों इनकी पीढ़ियों दो दूँ मैं धन।
जब भाई ही भाई का काट रहा है तन।

ये बेवकूफ समझते ही, जिस घर में होगा ज़्यादा प्रकाश।

उस घर में आकर करूंगी इनकी तीन पीढ़ियों तक निवास।

अरे चीनी लड़ियाँ लगा कर करते हो घर में ये उजाला।
बताओ कभी दिल से, कितने दीयों में खुद तेल डाला।

अब अपने बच्चों के लिए तो, मांग रहे हैं धन।

कितनी बार तोडा पहलेअपने माँबाप का मन।

करी न माँबाप की इज़्ज़त और बना दिया उनको ही आज दूजा।
जब तुम बच्चे थे तो वही माँबाप करते थे तुम्हारे लिए येही पूजा।

जैसा बोवेगे वैसा ही काटेगो, ये रखो ध्यान।

तुम्हारे ही बच्चे भी करेंगे तुम्हारा भी अपमान।

इन मूर्खों को समझायो पवन के ये सब इंसान तो है मेरी अपनी ही संतान।
अगर ये करे साल भर मेरा दिल से ध्यान तो मैं इन्हें ज़रूर करुँगी धनवान।

करें माँबाप की पूजा निरंतर और करें उनका दिल से सम्मान।

माँबाप के चरणों मैं लगाएं ध्यान तो शांति से मिलेगा धनधान। 

ऐ दोस्त माँबाप से दूर रहना इंसान की भूल है, माँबाप के कदमो की मिट्टी, जन्नत की धूल है।
माँ होती जन्नत का एक फूल है, औलाद को हर पल प्यार करना उसका प्रथम उसूल है।
कहे पवन दुनिया की दुआ मिन्नतें फिजूल है,रब से की माँ की हर दुआ रब को कबूल है।

 © Pavan Datta

Beautiful lines for Diwali Festival by Ex Prime Minister of India Shri Atal Bihari Bajpai ji:-

जब मन में हो मौज बहारों की

चमकाएँ चमक सितारों की,

जब ख़ुशियों के शुभ घेरे हों

तन्हाई में भी मेले हों,

आनंद की आभा होती है

उस रोज़ 'दिवाली' होती है ।

जब प्रेम के दीपक जलते हों

सपने जब सच में बदलते हों,

मन में हो मधुरता भावों की

जब लहके फ़सलें चावों की,

उत्साह की आभा होती है

उस रोज़ दिवाली होती है ।

जब प्रेम से मीत बुलाते हों

दुश्मन भी गले लगाते हों,

जब कहींं किसी से वैर न हो

सब अपने हों, कोई ग़ैर न हो,

अपनत्व की आभा होती है

उस रोज़ दिवाली होती है ।

जब तन-मन-जीवन सज जाएं

सद्-भाव के बाजे बज जाएं,

महकाए ख़ुशबू ख़ुशियों की

मुस्काएं चंदनिया सुधियों की,

तृप्ति की आभा होती है

उस रोज़ 'दिवाली' होती है .। -

--अटलबिहारी वाजपेयी

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चाँद को भगवान् राम से यह शिकायत है की दीपवली का त्यौहार अमावस की रात में मनाया जाता है और क्योंकि अमावस की रात में चाँद निकलता ही नहीं है इसलिए वह कभी भी दीपावली मना नहीं सकता। यह एक मधुर कविता है कि चाँद किस प्रकार खुद को राम के हर कार्य से जोड़ लेता है और फिर राम से शिकायत करता है और राम भी उस की बात से सहमत हो कर उसे वरदान दे बैठते हैं आइये देखते हैं ।

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जब चाँद का धीरज छूट गया ।

वह रघुनन्दन से रूठ गया ।

बोला रात को आलोकित हम ही ने करा है ।

स्वयं शिव ने हमें अपने सिर पे धरा है ।

तुमने भी तो उपयोग किया हमारा है ।

हमारी ही चांदनी में सिया को निहारा है ।

सीता के रूप को हम ही ने सँभारा है ।

चाँद के तुल्य उनका मुखड़ा निखारा है ।

जिस वक़्त याद में सीता की ,

तुम चुपके - चुपके रोते थे ।

उस वक़्त तुम्हारे संग में बस ,

हम ही जागते होते थे ।

संजीवनी लाऊंगा ,

लखन को बचाऊंगा ,.

हनुमान ने तुम्हे कर तो दिया आश्वश्त

मगर अपनी चांदनी बिखरा कर,

मार्ग मैंने ही किया था प्रशस्त ।

तुमने हनुमान को गले से लगाया ।

मगर हमारा कहीं नाम भी न आया ।

रावण की मृत्यु से मैं भी प्रसन्न था ।

तुम्हारी विजय से प्रफुल्लित मन था ।

मैंने भी आकाश से था पृथ्वी पर झाँका ।

गगन के सितारों को करीने से टांका ।

सभी ने तुम्हारा विजयोत्सव मनाया।

सारे नगर को दुल्हन सा सजाया ।

इस अवसर पर तुमने सभी को बुलाया ।

बताओ मुझे फिर क्यों तुमने भुलाया ।

क्यों तुमने अपना विजयोत्सव

अमावस्या की रात को मनाया ?

अगर तुम अपना उत्सव किसी और दिन मानते ।

आधे अधूरे ही सही हम भी शामिल हो जाते ।

मुझे सताते हैं , चिड़ाते हैं लोग ।

आज भी दिवाली अमावस में ही मनाते हैं लोग ।

तो राम ने कहा, क्यों व्यर्थ में घबराता है ?

जो कुछ खोता है वही तो पाता है ।

जा तुझे अब लोग न सतायेंगे ।

आज से सब तेरा मान ही बढाएंगे ।

जो मुझे राम कहते थे वही ,

आज से रामचंद्र कह कर बुलायेंगे

© Pavan Datta


Always indebted and grateful to my parents (GOD)

P.S. I tried to write in Hindi Poetry to the best of my vocabulary. Please excuse me for grammar mistakes, if any.